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कुछ कारखाने और बिजलीघर अब अपनी छोड़ी गई कार्बन डाइऑक्साइड को आसमान तक पहुँचने से पहले ही पकड़ लेते हैं, और उसे ज़मीन के भीतर गहराई में भेज देते हैं।
कार्बन कैप्चर एंड स्टोरेज का मकसद औद्योगिक स्रोतों से निकलने वाले CO2 उत्सर्जन को वायुमंडल तक पहुंचने से पहले पकड़ना और फिर उन्हें गहरे भूमिगत स्थिर चट्टानी संरचनाओं में लंबे समय के लिए, लगभग स्थायी रूप से, संग्रहीत करना है, यह खासतौर पर सीमेंट और स्टील विनिर्माण जैसे उद्योगों को लक्ष्य बनाता है जिन्हें अकेले बिजलीकरण से डीकार्बनाइज करना बेहद कठिन है।
कार्बन डाइऑक्साइड को पीने के पानी में बदलना कोई असली रासायनिक प्रक्रिया नहीं है जो यह तकनीक करती है, CO2 और पानी बिल्कुल अलग अणु हैं और इनके बीच पूरी तरह असंबंधित रासायनिक परिवर्तन चाहिए होगा। सूरज की रोशनी रोककर धरती ठंडी करना एक पूरी तरह अलग और कहीं ज्यादा विवादास्पद विचार है जिसे सोलर जियोइंजीनियरिंग कहा जाता है, कार्बन कैप्चर नहीं।
बढ़ती दिलचस्पी के बावजूद, CCS आज भी वैश्विक औद्योगिक उत्सर्जन का सिर्फ एक छोटा हिस्सा ही पकड़ पाता है, क्योंकि कैप्चर उपकरण बनाने और CO2 को भूमिगत ले जाने वाली पाइपलाइनों की भारी लागत ने अब तक इसका इस्तेमाल कितना व्यापक हो सका, इसे सीमित रखा है।
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